सही थे मार्क्स
एलन वुड्स (लंदन 16 नवम्बर 2011)
(बेशक, लंबा लेकिन
एक जरूरी पठनीय आलेख। समकालीन जनमत जनवरी 2014 से साभार)
पूँजीवाद के संकट
के साथ बुर्जुआ विचार का भी संकट जुड़ा हुआ है, दर्शन, अर्थशास्त्र्ा,
नैतिकता- सभी उथल-पुथल के दौर में हैं। उस
आशावादिता, जिसने बड़े विश्वास से कहा
था कि पूँजीवाद ने अपने सारे संकटों से पार पा लिया है, की जगह अब सर्वग्रासी निराशा के अंध्ोरे ने ल्ो ली है। बहुत
दिन नहीं बीते जब गार्डन ब्राउन ने बड़े शान से कहा था ‘उभार और मंदी के चक्रों का दौर बीत चुका है।’ 2008 के भयावह संकट ने उसे अपने बड़बोल्ोपन पर
शर्मसार होने को मजबूर कर दिया।
यूरो संकट का
वर्तमान दौर दिखला चुका है कि बुर्जुआ के पास ग्रीस और इटली की समस्याओं के निदान
का कोई उपाय नहीं है जिसके चलते न सिर्फ यूरोपी साझा मुद्रा बल्कि खुद यूरोपी
यूनियन ई.यू. का भविष्य भी खतरे में हैं। यह एक नये विश्वव्यापी आर्थिक ध्वंस का
ऐसा उत्प्रेरक है जिसकी विभीषिका 2008 से कहीं भयावह होगी।
वर्तमान संकट की
खासियत यह थी कि इसका हो सकना मुमकिन ही नहीं माना जा रहा था। अभी हाल तक ज्यादातर
बुर्जुआ अर्थशास्त्र्ाी यही मान रहे थ्ो कि बाजार, बिना किसी हस्तक्ष्ोप के, खुदबखुद सारी समस्याओं को हल कर ल्ोने और आपूर्ति व भोग का
जादुई संतुलन बनाये रखने में सक्षम है, जिसके चलते अब कभी 1929 के महाध्वंस और
महामंदी की पुनरावृत्ति हो ही नहीं सकती (सुदक्ष-सक्षम बाजार अवधारणा)।
उत्पादन अतिरेक
के संकट की मार्क्स की भविष्यवाणी इतिहास के कचरेदान में डाल दी गयी थी। जो अभी भी
मार्क्स के इस विचार के हिमायती थ्ो कि पूंजीवादी व्यवस्था हल न किये जा सकने
वाल्ो अंतर्विरोधों से ग्रस्त है और उसमें खुद अपने विनाश के बीज अंतर्निहित है,
पागल-सनकियो की तरह देख्ो जा रहे थ्ो। क्या
सोवियत यूनियन का पतन कम्युनिज्म की विफलता को अंतिम रूप से साबित नहीं कर चुका था?
एकमात्र्ा सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के रूप में
पूँजीवाद की विजय के साथ क्या इतिहास का अन्त नहीं हो चुका था?
यह सब तब की
बातें थी। मगर पिछल्ो बीस साल के काल खण्ड में (मानव समाज के इतिहास की
दृष्टि से यह कोई लंबा समय नही है) इतिहास
यहां 1800 घूम चुका है। अब मार्क्स
और मार्क्सवाद के भूतपूर्व आलोचक एक अलग धुन बजा रहे हैं। अचानक कार्लमार्क्स के
आर्थिक सिद्धान्तों को बड़ी गंभीरता से लिया जाने लगा है। जर्मनी में ‘दास केपिटल’ अब बेस्ट सेलर बन चुकी है। भारी संख्या में अर्थशास्त्र्ाी
जो कुछ गलत घट गया उसकी व्याख्या के लिये इसके पन्ने खंगाल रहे
हैं।..........................
अब
अर्थशास्त्र्ाी एक नये महाविनाश की भविष्यवाणी कर रहे हैं; मुद्राओं और सरकारों का पतन जो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के
समूचे ताने-बाने पर संकट बन सकता है। घाटे पर अंकुश लगाने की जरुरत पर राजनीतिज्ञ
चाहे जो हाय-तौबा मचायें, जिस हद तक दुनिया
कर्ज में डूब चुकी है उसे पाटना संभव नहीं। ग्रीस इसका ज्वलंत उदाहरण है। भविष्य
और गहरे संकटों, गिरते जीवन
निर्वाह स्तरो, तकलीफ देह
समायोजनों और बहुसंख्या की बढ़ती दरिद्रता का है। यह और बड़े पैमाने की उथल-पुथल और
वर्ग संघर्ष का तैयार नुस्खा है। यह समूची दुनिया के पैमाने पर पूँजीवाद का
व्यवस्थाजन्य संकट है।...........................
अर्थशास्त्र्ाी,
मार्क्सवादियों पर दिवास्वप्न देखने का,
युटोपियन होने का इल्जाम लगाते हैं। मि. मैग्नस
पूँजीपतियों से बस इतना भर चाहते हैं कि वे पूँजीपतियों की तरह अपना व्यवहार थोड़ा
कम करके संत फ्रांसिस की तरह बर्ताव करें। यह तो आदमखोर बाघ में मांस छोड़ कर सलाद
खाने को कहना हुआ। और हम जानते हैं इस खुशनुमा प्रस्ताव पर बाघ की क्या
प्रतिक्रिया होगी। कहना न होगा कि इस कीन्सियन मूढ़ता से मार्क्स के विचारों का कुछ
ल्ोना-देना नहीं है।.......................
हमारे सामने दर
पेश समस्याओं का समाधान पहल्ो से वजूद में है। पिछल्ो दो सौ सालों में पूँजीवाद ने
विशालकाय उत्पादक शक्ति बना ली है। मगर यह इसकी क्षमता का पूरा इस्तेमाल करने में
अक्षम है। वर्तमान संकट सिर्फ इस तथ्य की अभिव्यक्ति है कि उद्योग, विज्ञान और तकनीक का इस सीमा तक विकास हो चुका
है कि इन्हें अब निजी मालिकाने और राष्ट्र-राज्य की संकुचित सीमाओं में बांध्ो रख
पाना संभव नहीं रह गया है।
बीस साल पहल्ो
फ्रांसिस फुकुयामा ने इतिहास के अंत का राग अलापा था। मगर इतिहास का अंत हुआ नहीं।
बल्कि, वास्तव में, हमारी प्रजाति का सच्चा इतिहास तब शुरु होगा जब
हम वर्ग विभाजित समाज की गुलामी को खत्म करके अपने जीवन और नियति पर खुद का
नियंत्र्ाण करना शुरु कर सकेंगे। यही दरअसल समाजवाद हैः जरुरतों की मजबूरी के
साम्राज्य से आजादी के साम्राज्य की ओर छलांग।
वर्तमान संकट इन
दमघोंटू सीमाओं के खिलाफ उत्पादक शक्तियों के विद्रोह की अभिव्यक्ति भर है। एक बार
उद्योग, कृषि, विज्ञान और तकनीक पूँजीवाद की दमघोंटू सीमाओं
से आजाद हो जायें, उत्पादक शक्तियाँ
बिना किसी कठिनाई के तमाम मानवीय अपेक्षाओं-जरुरतों को पूरा करने में सक्षम हो
जायेंगी।
इतिहास में पहली बार, मानवता अपनी संपूर्ण
क्षमता को हासिल करने के लिये स्वतंत्र्ा होगी। काम के घंटों में आम तौर पर कमी एक
सच्ची सांस्कृतिक क्रांति के लिये भौतिक आधार प्रदान करेगी। संस्कृति, कला, संगीत, साहित्य
और विज्ञान अकल्पनीय ऊँचाइयों की उड़ान भरेंगे।
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